Latest Current Affairs for All Competitive & Govt Exams

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📢 अनुकंपा नियुक्ती संदर्भातील सर्व महत्वाचे अपडेट्स एका ठिकाणी!✅ सुधारित धोरण काय आहे? https://youtu.be/Ja4tN9ntZ-g?si=v...
01/08/2025

📢 अनुकंपा नियुक्ती संदर्भातील सर्व महत्वाचे अपडेट्स एका ठिकाणी!

✅ सुधारित धोरण काय आहे? https://youtu.be/Ja4tN9ntZ-g?si=vOAkT4Y5L3B-pWsV
✅ वेळापत्रक कसे ठरते? https://youtu.be/V3uOF4lsruE?si=LMkEA_G6omajTK6D
✅ अर्ज व इच्छुकता पत्र कसे भरावे? https://youtu.be/3OQBSegvR_s?si=C1riA_ib-5FIuU8g
✅ प्रतीक्षा यादीतील उमेदवारांची बदली प्रक्रिया कशी असते? https://youtu.be/-6C9U-X8Itc?si=yGnb9yu3hdV2P-7B
✅ नियुक्ती आदेश मिळण्यास किती वेळ लागतो? https://youtu.be/GHtF5s5B_dY?si=Ih3B7W5qcaofBZ1R
✅ जिल्हा परिषद धोरणात बदल काय आहेत? https://youtu.be/vznajE4gKIo?si=_toxMdfBCxQWQEB7

🎯 अनुकंपा नियुक्तीची प्रत्येक पायरी समजून घ्या – योग्य माहिती, योग्य निर्णय!

#शासन_निर्णय https://t.me/GRShasanNirnay/164🔷 "अनुकंपा वेटिंग मंच" टेलिग्राम ग्रुप 👉 https://t.me/anukampawaitingव्हिडिओमध्ये काय आहे?या व्हिडिओमध्ये ...

MPSC औषध निरीक्षक भरती 2025: मोठी बातमी! अनुभवाची अट नाही | पात्रता, अभ्यासक्रम, पगार |       | संपूर्ण माहिती एकाच व्हि...
31/07/2025

MPSC औषध निरीक्षक भरती 2025: मोठी बातमी! अनुभवाची अट नाही | पात्रता, अभ्यासक्रम, पगार | | संपूर्ण माहिती एकाच व्हिडिओत!

MPSC औषध निरीक्षक (गट ब) भरती 2025 ची सविस्तर माहिती या व्हिडिओमध्ये दिली आहे. नुकत्याच झालेल्या बदलांनुसार, आता औषध निर.....

MPSC संयुक्त गट ब मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्रिका विश्लेषण १) इतिहास https://youtu.be/wiZulBsPnvQ?si=MaIx-0g-o09z-I85२) भूगो...
30/06/2025

MPSC संयुक्त गट ब मुख्य परीक्षा प्रश्नपत्रिका विश्लेषण
१) इतिहास https://youtu.be/wiZulBsPnvQ?si=MaIx-0g-o09z-I85
२) भूगोल https://youtu.be/Swk2lpOgr0k?si=asFxrU9SL3rK5hU3
३) राज्यघटना https://youtu.be/NKlTofLF8Qw
४) अर्थशास्त्र https://youtu.be/3jeARbHr8Gg?si=CKCf6O05Ht_4xX42
५) सामान्य विज्ञान https://youtu.be/QfRA3UDr7kk?si=qWisKtRLRbV_VYWv
६) माहिती तंत्रज्ञान संगणक https://youtu.be/i7neSrEXSFY
७) चालू घडामोडी https://youtu.be/5KGgw5_nfr4?si=oHzr9jyZ_lFEDdJQ

तुमचे किती बरोबर आले? | MPSC Group B Mains 2025 - Current Affairs Analysis | लगेच उत्तरे तपासा!MPSC Group B Mains परीक्षेच्या चालू घडामोडी (Current Affairs) ...

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21/06/2025

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21/06/2025

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25-06-2023     प्रात:मुरली  ओम् शान्ति 19.01.95 "बापदादा"    मधुबनब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रख आज्ञाकारी और सर्वन्श त्या...
25/06/2023

25-06-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 19.01.95 "बापदादा" मधुबन

ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रख आज्ञाकारी और सर्वन्श त्यागी बनो

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आज बेहद का बापदादा अपने बेहद के सेवा साथियों को देख रहे हैं। दो प्रकार के साथी हैं - एक हैं स्नेह सम्बन्ध का साथ निभाने वाले और दूसरे हैं स्नेह, सम्बन्ध और सेवा का साथ निभाने वाले। दोनों प्रकार के साथियों को देख रहे हैं। चाहे विश्व के लास्ट कोने में भी हैं लेकिन बापदादा के सामने हैं। बापदादा और बच्चों का वायदा है कि कहाँ भी रहेंगे, जहाँ भी हैं लेकिन सदा साथ हैं। ये ब्राह्मण जीवन आदि से अन्त तक बाप और बच्चों का अविनाशी साथ है। चाहे बच्चे साकार में हैं और बापदादा आकार निराकार हैं लेकिन अलग हैं क्या? नहीं है ना! तो दूर हो या समीप हो? ये दिल की समीपता साकार में भी समीपता अनुभव कराती है। चाहे किसी भी देश में हैं लेकिन दिल की समीपता साथ का अनुभव कराती है। अलग हो नहीं सकते, असम्भव है। परमात्म वायदा कभी टल नहीं सकता। परमात्म वायदा भावी बन जाता है तो भावी टाली नहीं टलेश् इसलिये सदा समीप हैं, सदा साथी हैं और साथी बन हाथ में हाथ, साथ लेते हुए कितने मौज से चल रहे हैं। मौज है कि मेहनत है? थोड़ी-थोड़ी मेहनत है? जब कोई बात आ जाती है तो बाप किनारे हो जाता है। कोई बात को नहीं लाओ तो बाप नहीं जायेगा। बात बाप को किनारे करती है। जैसे बीच में कोई पर्दा आ जाये, तो पर्दा आने से किनारा हो जाता है ना! तो ये बात रूपी पर्दा बीच-बीच में आ जाता है। लेकिन लाने वाला कौन? पर्दे का काम है आना और आपका काम क्या है? हटाना या थोड़ा-थोड़ा मजा लेना? बापदादा देखते हैं, बच्चे कभी-कभी बातों में बड़े मजे लेते हैं।

Brahmakumaris Songs https://youtu.be/_QevQkd_VZ8

जिससे प्यार होता है, प्यार की निशानी है साथ रहना। साथ रहने का मतलब यह नहीं है कि आबू में रहना। आबू में तो देखो अभी थोड़ी भी संख्या ज्यादा है तो पानी की मुश्किल हो गई है ना! तो साकार में साथ रहना नहीं लेकिन दिल से साथ निभाना। अगर दिल से साथ नहीं निभाते तो मधुबन में होते भी दूर हैं और लास्ट देश में रहते भी दिल से समीप हैं तो वो साथ हैं, इसीलिये बापदादा को दिलाराम कहते हैं, शरीर राम नहीं कहते। तो दिल बाप में है ना? बाप के दिल में आपका दिल है और आपके दिल में बाप का दिल है। तो दिल जाने इस रूहानी साथ को। अनुभवी हो ना? कि यहाँ से जायेंगे तो कहेंगे दूर हो गये? नहीं। सदा साथ निभाना - यह कोई भी आत्मा, आत्मा से नहीं निभा सकती। एक ही परम आत्मा आत्माओं से साथ निभा सकता है। और ये परमात्म साथ निभाने का भाग्य आप सभी बच्चों को ही है ना?

(आज पूरे हॉल में सभी भाई-बहिनें पट पर बैठे हुए हैं) बहुत अच्छी सीन है। बापदादा को आज की सभा का दृश्य देख करके यादगार याद आ रहा है। यादगार में रूद्र माला दिखाते हैं, उसमें सिर्फ फेस दिखाई देते हैं, शरीर नहीं दिखाई देते। तो यहाँ से भी सिर्फ फेस ही दिखाई दे रहे हैं, बाकी कुछ नहीं दिखाई देता। तो रूद्र माला का यादगार दिखाई दे रहा है। एक के पीछे एक बैठे हैं ना तो शरीर छिप गये हैं, फेस दिखाई दे रहे हैं।

ये है स्नेह का प्रत्यक्ष स्वरूप - ब्रह्मा बाप से सभी का स्नेह है तब तो आये हो ना! और कहलाते भी सभी ब्रह्माकुमार और ब्रह्मा-कुमारी हो, शिवकुमार, शिवकुमारी नहीं कहते। तो ब्रह्मा बाप से ज्यादा प्यार है ना! और ब्रह्मा बाप का भी सदा बच्चों से प्यार है। तभी तो अव्यक्त होते भी अव्यक्त पालना कर रहे हैं। अव्यक्त पालना मिल रही है ना? या आप कहेंगे कि हमने ब्रह्मा बाबा का अनुभव नहीं किया है? ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी कहलाते हो तो क्या बिना बाप की पालना के पैदा हो गये! अगर ब्रह्मा बाप की पालना नहीं होती तो आज सिर्फ निराकार बाप की पालना से यज्ञ की रचना और यज्ञ की वृद्धि नहीं होती। डबल फॉरेनर्स को ब्रह्मा बाप की पालना मिलती है ना? (हाँ जी) देखो, फॉरेन में बाप जाता है, तो इण्डिया में नहीं करता है क्या! तो उलहना तो नहीं देते कि बाबा हमने देखा ही नहीं! सदा मिलते, सदा देखते, सदा साथ रहते हैं। साकार शरीर में, साकार रूप में तो सदा साथ नहीं दे सकते लेकिन अव्यक्त रूप में सभी को साथ दे सकते हैं। जब चाहो मिलन के दरवाजे खुले हुए हैं। अव्यक्त वतन में नहीं कहेंगे कि अभी जगह नहीं है, अभी टाइम नहीं है, नहीं। देह में देह के बंधन हैं और अव्यक्त में न देह का बंधन है, न देह की दुनिया के कायदों का बंधन है। यहाँ तो कायदे रखने पड़ते हैं ना - आगे बैठो, पीछे बैठो। अभी भी समय प्रमाण बहुत-बहुत-बहुत भाग्यवान हो! फिर भी बैठने की जगह तो मिली है ना! फिर तो खड़े रहने की भी जगह मुश्किल होगी क्योंकि आप सभी को औरों को चांस देना पड़ेगा। अभी तो आप लोगों को चांस मिला है। जैसे अभी देखो मधुबन वालों को चांस देना पड़ा ना! (सभी मधुबन निवासी तथा आबू निवासी पाण्डव भवन में मुरली सुन रहे हैं) ये भी परिवार का प्यार है।

ब्रह्मा बाप से प्यार अर्थात् बाप समान बनना। निराकार के समान बनना, वो थोड़े समय का अनुभव करते हो। लेकिन ब्राह्मण अर्थात् सदा ब्रह्मा समान ब्रह्माचारी। जो ब्रह्मा बाप का आचरण वो ही सर्व ब्राह्मणों का आचरण अर्थात् कर्म। उच्चारण भी ब्रह्मा बाप समान है, आचरण भी ब्रह्मा बाप समान है, जिसको कहते हो फॉलो फादर। तो ब्रह्मा बाप के हर कदम पर कदम रखना इसको कहा जाता है फॉलो फादर। तो ब्रह्मा बाप ने बाप के श्रीमत पर पहला कदम क्या उठाया?

पहला कदम आज्ञाकारी बने। जो आज्ञा मिली उसी आज्ञा को प्रत्यक्ष स्वरूप में लाया। तो चेक करो कि आज्ञाकारी के पहले कदम में फॉलो फादर हैं? अमृतवेले से लेकर रात तक मन्सा, वाचा, कर्मणा, सम्बन्ध, सम्पर्क में जो आज्ञा मिली हुई है उसी आज्ञा प्रमाण चलते हैं? कि कोई आज्ञा पालन होती है और कोई नहीं होती है? संकल्प भी आज्ञा प्रमाण है कि मिक्स है? अगर मिक्स है तो फुल आज्ञाकारी हैं या अधूरे आज्ञाकारी? हर समय के संकल्प की आज्ञा स्पष्ट मिली हुई है। अमृतवेले क्या संकल्प करना है ये भी स्पष्ट है ना! तो फॉलो करते हो कि कभी परमधाम में चले जाते हो और कभी निद्रालोक में चले जाते हो? हर कर्म में, हर समय कदम पर कदम है? बाप का कदम एक और बच्चे का कदम दूसरा हो तो उसे आज्ञाकारी नहीं कहेंगे ना! चाहे परमार्थ में, चाहे व्यवहार में, दोनों में जो जैसी आज्ञा है वैसे आज्ञा को पालन करना - इसकी परसेन्टेज़ चेक करो। चेक करना आता है? तो पहला कदम आज्ञाकारी बने, इसलिये आज्ञाकारी को सदा बाप की दुआएं स्वत: मिलती हैं और साथ-साथ ब्राह्मण परिवार की भी दुआएं हैं। तो चेक करो कि जो भी संकल्प किया, चाहे स्व प्रति, चाहे सेवा के प्रति, चाहे स्थूल कर्म के प्रति या अन्य आत्माओं के प्रति उसमें सबकी दुआयें मिली? क्योंकि आज्ञाकारी बनने से सर्व की दुआयें मिलती हैं और यदि दुआयें मिल रही हैं तो उसकी निशानी है कि दुआओं के प्रभाव से दिल सदा सन्तुष्ट रहेगी, मन सन्तुष्ट रहेगा। बाहर की सन्तुष्टता नहीं लेकिन मन की सन्तुष्टता। और मन की सन्तुष्टता यथार्थ है वा मियाँ मिट्ठू हैं - इसकी निशानी, अगर यथार्थ रीति से यथार्थ आज्ञाकारी हैं, दुआएं हैं तो सदा स्वयं और सर्व डबल लाइट रहेंगे। अगर डबल लाइट नहीं रहते तो समझो मन की सन्तुष्टता नहीं। बाप की वा परिवार की दुआएं भी नहीं मिल रही हैं। परिवार की भी दुआएं आवश्यक हैं। ऐसे नहीं समझो कि बाप से हमारा कनेक्शन है, बाप की तो दुआएं हैं, परिवार से नहीं बनता कोई हर्जा नहीं। पहले भी सुनाया कि माला में सिर्फ युगल दाना नहीं है, उससे माला नहीं बनती। तो माला में आना है इसलिए पूरा लक्ष्य रखो कि हरेक आत्मा मुझे देखकर खुश रहे, देख करके हल्के हो जायें, बोझ खत्म हो जाए। तो दिल की सन्तुष्टता वा आज्ञाकारी की दुआएं स्वयं को भी लाइट और दूसरे को भी लाइट बनायेंगी। इससे समझो कि आज्ञाकारी कहाँ तक हैं? जैसे ब्रह्मा बाप को देखा हर एक छोटा-बड़ा सन्तुष्ट होकर खुशी में नाचता। नाचने के टाइम तो हल्के होंगे ना तभी तो नाचेंगे ना। चाहे कोई मोटा है लेकिन मन से हल्का है तो भी नाचता है और पतला है लेकिन भारी है तो नहीं नाचेगा। तो बोल ऐसे हों जो स्वयं भी अपने आपसे सन्तुष्ट हो और दूसरे भी सन्तुष्ट रहें। ऐसे नहीं, हमारा तो भाव नहीं था, हमारी तो भावना नहीं थी, लेकिन भाव और भावना पहुँचती क्यों नहीं? अगर सही है तो दूसरे तक वायब्रेशन्स क्यों नहीं जाता है? कोई तो कारण होगा ना? तो चेक करो दुआओं के पात्र कहाँ तक बने हैं?

जितना अभी बाप और ब्राह्मण आत्माओं की दुआओं के पात्र बनेंगे उतना ही राज्य के पात्र बनेंगे। अगर अभी ब्राह्मण परिवार को सन्तुष्ट नहीं कर सकते, तो राज्य क्या चलायेंगे! राज्य को क्या सन्तुष्ट करेंगे! क्योंकि ब्राह्मण आत्मायें आपकी रॉयल फैमिली बनेंगे तो जो फैमिली को सन्तुष्ट नहीं कर सकते वो प्रजा को क्या करेंगे? संस्कार तो यहाँ भरना है ना! कि वहाँ योग करके भरेंगे! यहाँ ही भरना है। अगर वर्तमान ब्राह्मण परिवार में कारण का निवारण नहीं कर सकते, कारण-कारण ही कहते रहते हैं, तो जहाँ कारण है वहाँ निवारण शक्ति नहीं है। अगर परिवार में निवारण शक्ति नहीं तो विश्व के राज्य को क्या निवारण करेंगे! क्योंकि आपके राज्य में हर आत्मा सदा निवारण स्वरूप है। वहाँ कारण होंगे क्या? जैसे अभी राज्य सभा में कारण बताते हैं - ये कारण है, ये कारण है, ये कारण है... वहाँ ऐसे राज्य दरबार होगी क्या? वहाँ तो सिर्फ खुश ख़ैऱाफत पूछेंगे। सिर्फ दरबार नहीं है लेकिन बहुत अच्छा मिलन है। तो कारण कहकर अपने को दुआओं से वंचित नहीं करो। ब्रह्मा बाप ने कारण को निवारण किया इसीलिये नम्बरवन हुआ। बापदादा के पास सभी के कारणों के फाइल ही इकट्ठे होते हैं। सभी के फाइल हैं - किसका छोटा, किसका बड़ा फाइल है। तो अभी भी फाइलें रखनी है, फाइल बढ़ाते रहना है या रिफाइन होना है? तो आज से फाइल सब खत्म कर दें? फिर दूसरा नया फाइल तो नहीं रखना पड़ेगा। अगर नया फाइल रखा तो फाइन पड़ेगा। सोच लो! बोलो - खत्म करें कि थोड़ा दिन रखें? शिव रात्रि तक रखें! जो समझते हैं शिवरात्रि तक थोड़ी मार्जिन मिलनी चाहिये, तब तक पुरुषार्थ करके रिफाइन हो जायेंगे, वो हाथ उठाओ। अच्छा है, हिम्मत रखना भी अच्छी बात है। लेकिन सिर्फ अभी हिम्मत नहीं रखना। ऐसे तो नहीं बापदादा के सामने थे तो हिम्मत थी, नीचे उतरे तो थोड़ी हिम्मत कम हो गई और अपने देशों में गये तो और कम हो गई। कोई बात आई तो और कम हो गई। ऐसे तो नहीं करेंगे? देखो जब कोई भी कारण सामने आता है और कारण के कारण हिम्मत कम होती है, कमजोरी आती है और जब वो बात समाप्त हो जाती है तो अपने ऊपर शर्म आती है ना! अपने ऊपर ही संकोच होता है कि ये अच्छा नहीं किया, ये अच्छा नहीं हुआ। करके और फिर पश्चाताप् करे... ये तो आपकी प्रजा का काम है या आपका है? पश्चाताप् वाले क्या राजा बनेंगे? तो सोचो साक्षी स्थिति के सिंहासन पर बैठ जाओ और अपने आपको ही जज करो। अपना जज बनना, दूसरे का जज नहीं बनना। दूसरे का जज बनना सभी को आता है, दूसरे का जज बहुत जल्दी बन जाते हैं और अपना वकील बन जाते हैं। तो साक्षीपन के सिंहासन पर अपने आपका निर्णय बहुत अच्छा होगा। सिंहासन के नीचे रहकर जज करते हो तो निर्णय अच्छा नहीं होता। सेकेण्ड में तख्तनशीन बन जाओ। ये स्थिति आपका तख्त है। यथार्थ सहज निर्णय का तख्त ये साक्षीपन की स्थिति है। साक्षी नहीं होते हैं तो दूसरे की बात, दूसरे की चलन वो ज्यादा सामने आती है, अपनी नहीं आती। अगर साक्षी होकर देखेंगे तो अपनी भी नज़र आयेगी, दूसरे की भी नज़र आयेगी। फिर जजमेन्ट जो होगी वो यथार्थ होगी, नहीं तो यथार्थ नहीं होती।

बापदादा ने पहले भी सुनाया था कि ड्रामा में जो भी बातें आती हैं, उन बातों में बहुत अच्छा अक्ल है लेकिन कभी-कभी ब्राह्मण बच्चों में अक्ल थोड़ा कम हो जाता है। बात आती है और चली जाती है, लेकिन ब्राह्मण बच्चे बात को पकड़कर बैठते हैं। बात रूकती नहीं, चली जाती है लेकिन स्वयं बात को नहीं छोड़ते। तो बातों में अक्ल ज्यादा हुआ या ब्राह्मणों में? बातें अक्ल वाली हुई ना! कई बच्चे कहते हैं दो दिन से ये बात चल रही है, दो घण्टे ये बात चली और दो घण्टे में गँवाया कितना? दो दिन में गँवाया कितना? तो अक्ल वाले बनो। अच्छा।

चारों ओर के सर्व बापदादा के स्नेह को प्रत्यक्ष करने वाले, फॉलो फादर करने वाले श्रेष्ठ आत्मायें, सदा बापदादा के कदम पर कदम रखने वाले आज्ञाकारी श्रेष्ठ आत्मायें, सदा दृढ़ संकल्प द्वारा ब्रह्मा बाप समान सर्वंश त्यागी विशेष आत्मायें, सदा सपूत बन हर समय सबूत देने वाले सुपात्र आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

वरदान:-
ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रख हद को बेहद में समाने वाले बेहद के बादशाह भव

फालो फादर करना अर्थात् मेरे को तेरे में समाना, हद को बेहद में समाना, अभी इस कदम पर कदम रखने की आवश्यकता है। सबके संकल्प, बोल, सेवा की विधि बेहद की अनुभव हो। स्व-परिवर्तन के लिए हद को सर्व वंश सहित समाप्त करो, जिसको भी देखो वा जो भी आपको देखे - बेहद के बादशाह का नशा अनुभव हो। सेवा भी हो, सेन्टर्स भी हों लेकिन हद का नाम निशान न हो तब विश्व के राज्य का तख्त प्राप्त होगा।

स्लोगन:-
अपने ख्यालात आलीशान बना लो तो छोटी-छोटी बातों में टाइम वेस्ट नहीं जायेगा।

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23-06-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन“मीठे बच्चे - तुम सबका प्राण आधार आया है तुम्हें जमघटों के दु:खों की पी...
23/06/2023

23-06-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम सबका प्राण आधार आया है तुम्हें जमघटों के दु:खों की पीड़ा से छुड़ाने, वह तुम्हें स्वर्ग का वर्सा देता, वह सर्वव्यापी नहीं है''

प्रश्नः-
इस राजयोग में कौन-सा योग सदा कम्बाइण्ड है?

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उत्तर:-
इस राजयोग में प्रजायोग सदा ही कम्बाइण्ड है क्योंकि राजा-रानी के साथ-साथ प्रजा भी चाहिए। अगर सब राजा बन जायें तो किस पर राज्य करेंगे? सब कहते हैं हम महाराजा-महारानी बनेंगे, हम राजयोग सीखने आये हैं। परन्तु राजा-रानी बनने के लिए तो बहुत हिम्मत चाहिए। पूरा बल होना चाहिए। बाप पर पूरा-पूरा बलि चढ़े तब राजाई में जा सकें।

गीत:-
प्रीतम आन मिलो...
Click Here to Listen Song https://youtu.be/hxiy8qMPUUw

ओम् शान्ति। प्रीतम को कौन बुलाते हैं? प्रीतमा को सजनी वा भक्ति कहा जाता है। बुलाते हैं साजन को, भगवान को अथवा बाप को। इसमें सर्वव्यापी का ज्ञान तो ठहरता नहीं। प्रीतम को बुलाते हैं कि आन मिलो। जीव-आत्मायें अपने परमपिता परमात्मा को बुलाती हैं - ओ परमपिता परमात्मा आओ, रहम करो। स्वर्ग में तो ऐसे नहीं बुलायेंगे। बरोबर यह दु:खधाम है तो प्रीतम को बुलाते हैं। प्रीतम भगवान एक है। क्रियेटर एक है। विश्व अथवा सृष्टि का चक्र भी एक है। बच्चे जानते हैं कि कलियुग से फिर सतयुग होगा। सतयुग में फिर से एक आदि सनातन देवी-देवताओं का राज्य होगा। यह नॉलेज है ना। तुम बच्चे जानते हो प्रीतम कैसे आये हैं। शिव तो है निराकार। तुम सब निराकारी आत्मायें हो। यहाँ आये हो पार्ट बजाने। अब निराकार बाप कैसे आया? राजयोग किसने सिखलाया? श्रीकृष्ण तो सतयुग स्थापन करने वाला नहीं है, उनको रचयिता नहीं कहेंगे। सभी जीव आत्माओं का प्रीतम एक परमपिता परमात्मा क्रियेटर, निराकार को कहेंगे। कहते हैं - मेरा जन्म शिव जयन्ति मनाते हैं। मेरा जन्म कोई श्रीकृष्ण सदृश्य नहीं होता। श्रीकृष्ण माँ के गर्भ से कैसे जन्म लेते हैं - वह भी बच्चों को साक्षात्कार कराया हुआ है। बाप कहते हैं मेरा नाम रुद्र भी है। गीता में भी है - यह है रुद्र ज्ञान यज्ञ अर्थात् शिव का रचा हुआ यज्ञ। तो जरूर निराकार शिव को साकार में आना पड़े। बाप बैठ समझाते हैं - इस गीत के दो अक्षर से ही सर्वव्यापी का ज्ञान निकल जाता है। प्रीतम को श्रीकृष्ण नहीं कहेंगे। कहते ही हैं - ओ गॉड फादर। ओ प्राण आधार क्योंकि यह सबका प्राण आधार है। सभी को जमघटों के दु:ख की पीड़ा से छुड़ाते हैं, तो जरूर उनको आना पड़े। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प कल्प के संगमयुगे आता हूँ। यही कल्याणकारी संगमयुग है। सतयुग के बाद तो फिर दो कला कम हो जाती हैं। यही संगमयुग चढ़ती कला का युग है, इसमें बुद्धि से काम लेना चाहिए। नये के लिए तो बहुत सहज समझाते हैं। तुम्हारा बाप निराकार परमपिता परमात्मा शिव है। उनको याद करो, बस। और गुरू गोसाई आदि के मंत्र सब हैं भक्ति मार्ग के। भक्ति आधा-कल्प चलती है फिर ज्ञान का वर्सा आधा-कल्प चलता है। ज्ञान वहाँ नहीं रहेगा। ज्ञान दिया जाता है दुर्गति से सद्गति में ले जाने के लिए। गुरू का काम है शिष्य अथवा फालोअर्स की गति-सद्गति करना। परन्तु वह जानते नहीं कि गति-सद्गति क्या होती है। गाते भी हैं सर्व का सद्गति दाता राम। पतित-पावन सर्व सीताओं का राम। बच्चे जानते हैं कि सतयुग में एक ही धर्म रहता है। सूर्यवंशी राज्य चलता है। फिर राम राज्य त्रेता में दो कला कम हो जाती हैं। वहाँ रावण आदि होते नहीं। कोई उपद्रव की बात नहीं। यह सारी दुनिया लंका है, रावण का राज्य है। इस समय सब मनुष्य बन्दर से बदतर हैं क्योंकि सभी में 5 विकार प्रवेश हैं। कितना मनुष्यों में क्रोध है। एक दो को कैसे मारते हैं। मरने-मारने की तैयारी करते हैं। तुम सब विकारी थे। अब बाबा आकर रावण पर जीत पहनाते हैं। शास्त्रों में क्या-क्या बातें लिख दी हैं। ऐसे थोड़ेही पूंछ को आग लगी और सारी लंका जल गई। वास्तव में लंका यह सारी दुनिया है। तुम ब्राह्मण कुल भूषण बच्चे भी पहले पतित थे। अभी तुम माया रावण पर जीत पाते हो। बाप ने आकर बुद्धि का ताला खोला है। बुद्धिवानों की बुद्धि बाप है ना। मनुष्य तो क्या-क्या बातें सुनाकर माथा ही खराब कर देते हैं। बाप कहते हैं यह फिर भी होना ही है। सर्वव्यापी का ज्ञान पहले नहीं था। कहते थे परमात्मा बेअन्त है। बेअन्त कह फिर उनको सर्वव्यापी कहना कितनी बड़ी भूल है। शिवोहम् ततत्वम् कह देते हैं। कभी शिवोहम्, कभी फिर ब्रह्मोहम् भी कह देते। यह फिर राँग हो जाता है। ब्रह्म तो रहने का स्थान है। शिव बाबा ब्रह्म तत्व में रहते हैं इसलिए उनका नाम ब्रह्माण्ड है। हम आत्मायें भी वहाँ की रहने वाली हैं। वे लोग फिर शिव को नाम-रूप से न्यारा कह देते हैं, यह सब समझाने की बातें हैं ना। सो भी जब एक हफ्ता रेगुलर समझें तब ज्ञान से चोली रंग जाये। समझाना है तुम्हारा बेहद का बाप भी है, जिससे भारत को जीवन्मुक्ति का वर्सा मिलता है। बाकी सबको मुक्ति का वर्सा मिलता है।

बाप कहते हैं - बच्चे, अभी नाटक पूरा हुआ। तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए हैं। इतना समय पार्ट बजाया है, अब फिर वापस जाना है। बाप आकर हमारे लिए राजधानी स्थापन करते हैं तो जरूर संगम पर स्थापन हो, तब तो सतयुग में तुम वर्सा लो। तुमको कितना अच्छा कर्म सिखलाते हैं। लक्ष्मी-नारायण ने क्या किया जो ऐसे ऊंच बनें? अभी तुम जानते हो बाबा राजयोग सिखलाते हैं। सतयुग में थोड़ेही सिखलायेंगे। वहाँ तो है ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य। यह है कल्याणकारी संगमयुग, इसमें अच्छी रीति पुरुषार्थ करना है। बाप कहते हैं यह देह का भान छोड़ अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ बाप को याद करो। तुम धक्के खाकर थक गये हो। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ ही त्रिकालदर्शी बनते हैं। बनाने वाला है बाप।

स्वदर्शन-चक्र भी तुम फिराते हो। विष्णु कोई त्रिकालदर्शी नहीं है। उन्होंने फिर विष्णु को अलंकार दे दिये हैं। वास्तव में त्रिकालदर्शी तुम ब्राह्मण बनते हो। वर्णों का भी समझाया है। चोटी है ब्राह्मण वर्ण। भारतवासी चित्र बनाते हैं। चोटी देते नहीं। ब्राह्मण वर्ण गुम कर दिया है। प्रजापिता ब्रह्मा है ना। तो पहले ब्राह्मणों की चोटी होनी चाहिए। अभी तुम मुख वंशावली ब्राह्मण बने हो।

गीत में भी सुना - प्रीतम आन मिलो... सर्वव्यापी की बात नहीं। अभी तुम प्रीतमायें प्रीतम के सम्मुख बैठी हुई हो। प्रीतम अपना स्वर्ग का वर्सा दे रहे हैं। कितना अच्छा प्रीतम है! कहते हैं श्रीकृष्ण ने भगाया पटरानी बनाने। परन्तु समझते नहीं - पटरानी क्या चीज़ होती है। अभी तुम जानते हो और स्वर्ग का महाराजा-महारानी बनने लिए पुरुषार्थ करते हो। यह राजयोग है, इसमें प्रजायोग कम्बाइण्ड है। सिर्फ राजा-रानी थोड़ेही बनेंगे। सब कहते हैं महाराजा-महारानी बनेंगे। हम आये हैं राजयोग सीखने, परन्तु सब थोड़ेही महाराजा-महारानी बनेंगे। हिम्मत चाहिए। पूरा बल होना चाहिए। भक्ति मार्ग में जब नौधा भक्ति करते हैं तब साक्षात्कार होता है। शिव पर बलि चढ़ते हैं। वास्तव में बलि चढ़ना भी यहाँ की बात है। यह भी समझाया है - गीता, भागवत, रामायण, वेद आदि सतयुग-त्रेता में होते नहीं। ऐसे नहीं परम्परा से यह कोई चले आते हैं। यह तो द्वापर से चले हैं। फिर द्वापर में ही बनेंगे। मुसलमानों ने आकर राज्य लिया, मुहम्मद गजनवी ने लूटा - यह सब बातें तुम जान गये हो। हमने ही पूज्य से पुजारी बन अपना मन्दिर बनाया। तो कितनी हमको मिलकियत होगी! पाँच हजार वर्ष की बात है। सो भी शुरुआत में। फिर भक्ति मार्ग में भी तुमको कितना धन रहता है! जिसने हीरों-जवाहरों का मन्दिर बनाया, उनका अपना महल क्या होगा। नाम कितना ऊंच है। लक्ष्मी-नारायण कितने श्रृंगारे हुए देखते हो। अभी तो बिचारों के पास पैसा नहीं है। आगे तो लक्ष्मी-नारायण के लिए हीरों का सब कुछ बनाते थे। बाद में सब लूट फूट ले गये। वहाँ तो सोने की ईटें होती हैं, तुम उनसे महल बनाते हो। अक्ल भी अच्छा रहता है। अभी तो बेअक्ल हैं, तब तो कंगाल हुए हैं ना। शिवबाबा पर वा देवताओं पर कितने कलंक लगाये हैं इसलिए बाबा कहते हैं यदा यदाहि.... जब इसमें प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मणों को रचूँ। ब्रह्मा मुख से भारत में ही आकर ब्राह्मण रचते हैं। विलायत जाऊंगा क्या। जो नम्बरवन पावन पूज्य था, अब पुजारी बना है, उनके ही पतित शरीर में आता हूँ। त्रिमूर्ति कहते हैं, शिव को निकाल दिया है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा का तो अर्थ ही नहीं निकलता। बाबा कहते हैं कल्प-कल्प संगम पर इस तन में आकर तुम ब्राह्मणों को रचता हूँ। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियों का यह सर्वोत्तम युग है। अभी तुम ईश्वरीय गोद में हो। ईश्वर बाबा से बेहद का वर्सा लेते हो। जानते हो उनको ही याद करते-करते हम उनके पास पहुँच जायेंगे। कहते हैं ना अन्त काल जो स्त्री सुमिरे.... जैसा सुमिरन वैसा जन्म मिलता है। यह है अन्तकाल का समय। तुमको बाप बैठ समझाते हैं। इस समय मुझ बाप को ही याद करना है। देही-अभिमानी भव, अशरीरी भव। अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ परमपिता परमात्मा को याद करो। एक जगह नेष्ठा में नहीं बैठना है। बच्चे तो चलते-फिरते, उठते-बैठते बाप को याद करते हैं ना।

बेहद का बाप कहते हैं - और सभी से बुद्धि निकाल मामेकम् याद करो। इसी में मेहनत है। 84 जन्म लिए, अब यह अन्तिम जन्म है। तुम बाप के बने हो तो उसने ही कितने मीठे नाम दिये हैं। बाबा ने सन्देशी द्वारा नाम भेजे। वहाँ बहुत अच्छे-अच्छे नाम होते हैं। फिर भी वही नाम पड़ेंगे जो कल्प पहले पड़े होंगे। सर्वव्यापी का अर्थ भी समझाना चाहिए ना। सब भक्त भगवान हैं तो फिर उनको मिलेगा क्या। कुछ भी नहीं। अभी तुम ईश्वरीय गोद में हो। ईश्वरीय गोद से तुम ब्राह्मण बनते हो। शूद्र वर्ण खत्म हुआ। यह वर्ण है ही तुम भारतवासियों के लिए। तुम जानते हो हम शूद्र वर्ण से ट्रान्सफर हो ब्राह्मण धर्म में आये हैं। ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ वही बनेंगे जो कल्प पहले बने थे। झाड़ वृद्धि को पाता जाता है। कितनी अच्छी-अच्छी बातें बच्चों को सुनाते हैं। परन्तु माया का तूफान लगने से अच्छे-अच्छे बच्चे भी गिर पड़ते हैं। युद्ध तो है ना। तुम सर्वशक्तिमान के बच्चे हो तो माया भी कम नहीं है। आधा-कल्प रावण का राज्य है। इस समय माया भी जोर से पछाड़ेगी, इसको तूफान कहा जाता है। हनूमान का मिसाल है ना। तुमको माया के कितने भी तूफान आयें परन्तु हिलना नहीं है। सदैव हर्षित रहना है। जितना रुस्तम बनेंगे उतना माया जोर से वार करेगी। देखेगी - लायक है वा नहीं? कहते हैं - बाबा, हमने तो काला मुंह कर दिया। काला मुंह हुआ, बस, बुद्धि को ताला लग जायेगा। धारणा होगी नहीं क्योंकि बाबा को कलंक लगाया ना। लौकिक बाप भी कहते हैं ना तुम कुल-कलंकित हो। बाबा समझाते हैं - तुम कभी भी कुल कलंकित नहीं बनना। बाप परमधाम से आये हैं तुमको पढ़ाने। भगवानुवाच - मैं राजाओं का राजा बनाने आया हूँ। राजाई जरूर स्थापन होगी। इस समय तुम जितने ब्राह्मण बने हो उतने ही बने थे और बनते रहेंगे।

बच्चों को याद रखना है कि उस पारलौकिक बाबा का कोई बाप नहीं है। वह है ही सुप्रीम नॉलेजफुल, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप चैतन्य, पतित-पावन, रहमदिल, नॉलेजफुल, ब्लिसफुल। उन पर कोई ब्लिस करने वाला नहीं है। वह खुद ही बाप, टीचर, सतगुरू है। बेहद बाप के घर में तुम सम्मुख बैठे हो। यह है ईश्वरीय कुटुम्ब। वृद्धि को पाते जायेंगे। 84 का चक्र भी बुद्धि में याद है। हम सो देवता इतने जन्म, हम सो क्षत्रिय इतने जन्म.... फिर हम सो देवता बनेंगे। माया दु:खधाम बनाती है। बाप आकर सुखधाम बनाते हैं। कितना सहज है। खूब पुरुषार्थ करना चाहिए। अब का पुरुषार्थ कल्प-कल्प के लिए तुम्हारा पुरुषार्थ बन जायेगा। कहेंगे कल्प कल्पान्तर हम ऐसा पुरुषार्थ करते आये हैं। मम्मा-बाबा भी पुरुषार्थ करते हैं। यही फिर पूज्य सो देवी-देवता लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। श्रीमत पर हम श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस अन्तकाल के समय में एक बाप को ही याद करने का अभ्यास करना है। अशरीरी बनना है।

2) कभी भी कुल कलंकित नहीं बनना है, माया के तूफानों में हिलना नहीं है। सदा हर्षित रहना है।

वरदान:-
अपने चेहरे रूपी दर्पण द्वारा मन की शक्तियों का साक्षात्कार कराने वाले योगी तू आत्मा भव

जो मन में होता है उसकी झलक मस्तक पर जरूर आती है। ऐसे नहीं समझना कि मन में तो हमारे बहुत कुछ है। लेकिन मन की शक्ति का दर्पण चेहरा अर्थात् मुखड़ा है। कितना भी आप कहो हमारा योग तो बहुत अच्छा है, हम सदा खुशी में नाचते हैं लेकिन चेहरा उदास देख कोई नहीं मानेगा। “पा लिया'' इस खुशी की चमक चेहरे से दिखाई दे। खुश्क चेहरा नहीं दिखाई दे, खुशी का चेहरा दिखाई दे, तब कहेंगे योगी तू आत्मा।

स्लोगन:-
जब सरल स्वभाव, सरल बोल, सरलता सम्पन्न कर्म हों तब बाप का नाम बाला कर सकेंगे।

23/06/2023

23-06-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम सबका प्राण आधार आया है तुम्हें जमघटों के दु:खों की पीड़ा से छुड़ाने, वह तुम्हें स्वर्ग का वर्सा देता, वह सर्वव्यापी नहीं है''

प्रश्नः-
इस राजयोग में कौन-सा योग सदा कम्बाइण्ड है?

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उत्तर:-
इस राजयोग में प्रजायोग सदा ही कम्बाइण्ड है क्योंकि राजा-रानी के साथ-साथ प्रजा भी चाहिए। अगर सब राजा बन जायें तो किस पर राज्य करेंगे? सब कहते हैं हम महाराजा-महारानी बनेंगे, हम राजयोग सीखने आये हैं। परन्तु राजा-रानी बनने के लिए तो बहुत हिम्मत चाहिए। पूरा बल होना चाहिए। बाप पर पूरा-पूरा बलि चढ़े तब राजाई में जा सकें।

गीत:-
प्रीतम आन मिलो...
Click Here to Listen Song https://youtu.be/hxiy8qMPUUw

ओम् शान्ति। प्रीतम को कौन बुलाते हैं? प्रीतमा को सजनी वा भक्ति कहा जाता है। बुलाते हैं साजन को, भगवान को अथवा बाप को। इसमें सर्वव्यापी का ज्ञान तो ठहरता नहीं। प्रीतम को बुलाते हैं कि आन मिलो। जीव-आत्मायें अपने परमपिता परमात्मा को बुलाती हैं - ओ परमपिता परमात्मा आओ, रहम करो। स्वर्ग में तो ऐसे नहीं बुलायेंगे। बरोबर यह दु:खधाम है तो प्रीतम को बुलाते हैं। प्रीतम भगवान एक है। क्रियेटर एक है। विश्व अथवा सृष्टि का चक्र भी एक है। बच्चे जानते हैं कि कलियुग से फिर सतयुग होगा। सतयुग में फिर से एक आदि सनातन देवी-देवताओं का राज्य होगा। यह नॉलेज है ना। तुम बच्चे जानते हो प्रीतम कैसे आये हैं। शिव तो है निराकार। तुम सब निराकारी आत्मायें हो। यहाँ आये हो पार्ट बजाने। अब निराकार बाप कैसे आया? राजयोग किसने सिखलाया? श्रीकृष्ण तो सतयुग स्थापन करने वाला नहीं है, उनको रचयिता नहीं कहेंगे। सभी जीव आत्माओं का प्रीतम एक परमपिता परमात्मा क्रियेटर, निराकार को कहेंगे। कहते हैं - मेरा जन्म शिव जयन्ति मनाते हैं। मेरा जन्म कोई श्रीकृष्ण सदृश्य नहीं होता। श्रीकृष्ण माँ के गर्भ से कैसे जन्म लेते हैं - वह भी बच्चों को साक्षात्कार कराया हुआ है। बाप कहते हैं मेरा नाम रुद्र भी है। गीता में भी है - यह है रुद्र ज्ञान यज्ञ अर्थात् शिव का रचा हुआ यज्ञ। तो जरूर निराकार शिव को साकार में आना पड़े। बाप बैठ समझाते हैं - इस गीत के दो अक्षर से ही सर्वव्यापी का ज्ञान निकल जाता है। प्रीतम को श्रीकृष्ण नहीं कहेंगे। कहते ही हैं - ओ गॉड फादर। ओ प्राण आधार क्योंकि यह सबका प्राण आधार है। सभी को जमघटों के दु:ख की पीड़ा से छुड़ाते हैं, तो जरूर उनको आना पड़े। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प कल्प के संगमयुगे आता हूँ। यही कल्याणकारी संगमयुग है। सतयुग के बाद तो फिर दो कला कम हो जाती हैं। यही संगमयुग चढ़ती कला का युग है, इसमें बुद्धि से काम लेना चाहिए। नये के लिए तो बहुत सहज समझाते हैं। तुम्हारा बाप निराकार परमपिता परमात्मा शिव है। उनको याद करो, बस। और गुरू गोसाई आदि के मंत्र सब हैं भक्ति मार्ग के। भक्ति आधा-कल्प चलती है फिर ज्ञान का वर्सा आधा-कल्प चलता है। ज्ञान वहाँ नहीं रहेगा। ज्ञान दिया जाता है दुर्गति से सद्गति में ले जाने के लिए। गुरू का काम है शिष्य अथवा फालोअर्स की गति-सद्गति करना। परन्तु वह जानते नहीं कि गति-सद्गति क्या होती है। गाते भी हैं सर्व का सद्गति दाता राम। पतित-पावन सर्व सीताओं का राम। बच्चे जानते हैं कि सतयुग में एक ही धर्म रहता है। सूर्यवंशी राज्य चलता है। फिर राम राज्य त्रेता में दो कला कम हो जाती हैं। वहाँ रावण आदि होते नहीं। कोई उपद्रव की बात नहीं। यह सारी दुनिया लंका है, रावण का राज्य है। इस समय सब मनुष्य बन्दर से बदतर हैं क्योंकि सभी में 5 विकार प्रवेश हैं। कितना मनुष्यों में क्रोध है। एक दो को कैसे मारते हैं। मरने-मारने की तैयारी करते हैं। तुम सब विकारी थे। अब बाबा आकर रावण पर जीत पहनाते हैं। शास्त्रों में क्या-क्या बातें लिख दी हैं। ऐसे थोड़ेही पूंछ को आग लगी और सारी लंका जल गई। वास्तव में लंका यह सारी दुनिया है। तुम ब्राह्मण कुल भूषण बच्चे भी पहले पतित थे। अभी तुम माया रावण पर जीत पाते हो। बाप ने आकर बुद्धि का ताला खोला है। बुद्धिवानों की बुद्धि बाप है ना। मनुष्य तो क्या-क्या बातें सुनाकर माथा ही खराब कर देते हैं। बाप कहते हैं यह फिर भी होना ही है। सर्वव्यापी का ज्ञान पहले नहीं था। कहते थे परमात्मा बेअन्त है। बेअन्त कह फिर उनको सर्वव्यापी कहना कितनी बड़ी भूल है। शिवोहम् ततत्वम् कह देते हैं। कभी शिवोहम्, कभी फिर ब्रह्मोहम् भी कह देते। यह फिर राँग हो जाता है। ब्रह्म तो रहने का स्थान है। शिव बाबा ब्रह्म तत्व में रहते हैं इसलिए उनका नाम ब्रह्माण्ड है। हम आत्मायें भी वहाँ की रहने वाली हैं। वे लोग फिर शिव को नाम-रूप से न्यारा कह देते हैं, यह सब समझाने की बातें हैं ना। सो भी जब एक हफ्ता रेगुलर समझें तब ज्ञान से चोली रंग जाये। समझाना है तुम्हारा बेहद का बाप भी है, जिससे भारत को जीवन्मुक्ति का वर्सा मिलता है। बाकी सबको मुक्ति का वर्सा मिलता है।

बाप कहते हैं - बच्चे, अभी नाटक पूरा हुआ। तुम्हारे 84 जन्म पूरे हुए हैं। इतना समय पार्ट बजाया है, अब फिर वापस जाना है। बाप आकर हमारे लिए राजधानी स्थापन करते हैं तो जरूर संगम पर स्थापन हो, तब तो सतयुग में तुम वर्सा लो। तुमको कितना अच्छा कर्म सिखलाते हैं। लक्ष्मी-नारायण ने क्या किया जो ऐसे ऊंच बनें? अभी तुम जानते हो बाबा राजयोग सिखलाते हैं। सतयुग में थोड़ेही सिखलायेंगे। वहाँ तो है ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य। यह है कल्याणकारी संगमयुग, इसमें अच्छी रीति पुरुषार्थ करना है। बाप कहते हैं यह देह का भान छोड़ अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ बाप को याद करो। तुम धक्के खाकर थक गये हो। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ ही त्रिकालदर्शी बनते हैं। बनाने वाला है बाप।

स्वदर्शन-चक्र भी तुम फिराते हो। विष्णु कोई त्रिकालदर्शी नहीं है। उन्होंने फिर विष्णु को अलंकार दे दिये हैं। वास्तव में त्रिकालदर्शी तुम ब्राह्मण बनते हो। वर्णों का भी समझाया है। चोटी है ब्राह्मण वर्ण। भारतवासी चित्र बनाते हैं। चोटी देते नहीं। ब्राह्मण वर्ण गुम कर दिया है। प्रजापिता ब्रह्मा है ना। तो पहले ब्राह्मणों की चोटी होनी चाहिए। अभी तुम मुख वंशावली ब्राह्मण बने हो।

गीत में भी सुना - प्रीतम आन मिलो... सर्वव्यापी की बात नहीं। अभी तुम प्रीतमायें प्रीतम के सम्मुख बैठी हुई हो। प्रीतम अपना स्वर्ग का वर्सा दे रहे हैं। कितना अच्छा प्रीतम है! कहते हैं श्रीकृष्ण ने भगाया पटरानी बनाने। परन्तु समझते नहीं - पटरानी क्या चीज़ होती है। अभी तुम जानते हो और स्वर्ग का महाराजा-महारानी बनने लिए पुरुषार्थ करते हो। यह राजयोग है, इसमें प्रजायोग कम्बाइण्ड है। सिर्फ राजा-रानी थोड़ेही बनेंगे। सब कहते हैं महाराजा-महारानी बनेंगे। हम आये हैं राजयोग सीखने, परन्तु सब थोड़ेही महाराजा-महारानी बनेंगे। हिम्मत चाहिए। पूरा बल होना चाहिए। भक्ति मार्ग में जब नौधा भक्ति करते हैं तब साक्षात्कार होता है। शिव पर बलि चढ़ते हैं। वास्तव में बलि चढ़ना भी यहाँ की बात है। यह भी समझाया है - गीता, भागवत, रामायण, वेद आदि सतयुग-त्रेता में होते नहीं। ऐसे नहीं परम्परा से यह कोई चले आते हैं। यह तो द्वापर से चले हैं। फिर द्वापर में ही बनेंगे। मुसलमानों ने आकर राज्य लिया, मुहम्मद गजनवी ने लूटा - यह सब बातें तुम जान गये हो। हमने ही पूज्य से पुजारी बन अपना मन्दिर बनाया। तो कितनी हमको मिलकियत होगी! पाँच हजार वर्ष की बात है। सो भी शुरुआत में। फिर भक्ति मार्ग में भी तुमको कितना धन रहता है! जिसने हीरों-जवाहरों का मन्दिर बनाया, उनका अपना महल क्या होगा। नाम कितना ऊंच है। लक्ष्मी-नारायण कितने श्रृंगारे हुए देखते हो। अभी तो बिचारों के पास पैसा नहीं है। आगे तो लक्ष्मी-नारायण के लिए हीरों का सब कुछ बनाते थे। बाद में सब लूट फूट ले गये। वहाँ तो सोने की ईटें होती हैं, तुम उनसे महल बनाते हो। अक्ल भी अच्छा रहता है। अभी तो बेअक्ल हैं, तब तो कंगाल हुए हैं ना। शिवबाबा पर वा देवताओं पर कितने कलंक लगाये हैं इसलिए बाबा कहते हैं यदा यदाहि.... जब इसमें प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मणों को रचूँ। ब्रह्मा मुख से भारत में ही आकर ब्राह्मण रचते हैं। विलायत जाऊंगा क्या। जो नम्बरवन पावन पूज्य था, अब पुजारी बना है, उनके ही पतित शरीर में आता हूँ। त्रिमूर्ति कहते हैं, शिव को निकाल दिया है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा का तो अर्थ ही नहीं निकलता। बाबा कहते हैं कल्प-कल्प संगम पर इस तन में आकर तुम ब्राह्मणों को रचता हूँ। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियों का यह सर्वोत्तम युग है। अभी तुम ईश्वरीय गोद में हो। ईश्वर बाबा से बेहद का वर्सा लेते हो। जानते हो उनको ही याद करते-करते हम उनके पास पहुँच जायेंगे। कहते हैं ना अन्त काल जो स्त्री सुमिरे.... जैसा सुमिरन वैसा जन्म मिलता है। यह है अन्तकाल का समय। तुमको बाप बैठ समझाते हैं। इस समय मुझ बाप को ही याद करना है। देही-अभिमानी भव, अशरीरी भव। अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ परमपिता परमात्मा को याद करो। एक जगह नेष्ठा में नहीं बैठना है। बच्चे तो चलते-फिरते, उठते-बैठते बाप को याद करते हैं ना।

बेहद का बाप कहते हैं - और सभी से बुद्धि निकाल मामेकम् याद करो। इसी में मेहनत है। 84 जन्म लिए, अब यह अन्तिम जन्म है। तुम बाप के बने हो तो उसने ही कितने मीठे नाम दिये हैं। बाबा ने सन्देशी द्वारा नाम भेजे। वहाँ बहुत अच्छे-अच्छे नाम होते हैं। फिर भी वही नाम पड़ेंगे जो कल्प पहले पड़े होंगे। सर्वव्यापी का अर्थ भी समझाना चाहिए ना। सब भक्त भगवान हैं तो फिर उनको मिलेगा क्या। कुछ भी नहीं। अभी तुम ईश्वरीय गोद में हो। ईश्वरीय गोद से तुम ब्राह्मण बनते हो। शूद्र वर्ण खत्म हुआ। यह वर्ण है ही तुम भारतवासियों के लिए। तुम जानते हो हम शूद्र वर्ण से ट्रान्सफर हो ब्राह्मण धर्म में आये हैं। ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ वही बनेंगे जो कल्प पहले बने थे। झाड़ वृद्धि को पाता जाता है। कितनी अच्छी-अच्छी बातें बच्चों को सुनाते हैं। परन्तु माया का तूफान लगने से अच्छे-अच्छे बच्चे भी गिर पड़ते हैं। युद्ध तो है ना। तुम सर्वशक्तिमान के बच्चे हो तो माया भी कम नहीं है। आधा-कल्प रावण का राज्य है। इस समय माया भी जोर से पछाड़ेगी, इसको तूफान कहा जाता है। हनूमान का मिसाल है ना। तुमको माया के कितने भी तूफान आयें परन्तु हिलना नहीं है। सदैव हर्षित रहना है। जितना रुस्तम बनेंगे उतना माया जोर से वार करेगी। देखेगी - लायक है वा नहीं? कहते हैं - बाबा, हमने तो काला मुंह कर दिया। काला मुंह हुआ, बस, बुद्धि को ताला लग जायेगा। धारणा होगी नहीं क्योंकि बाबा को कलंक लगाया ना। लौकिक बाप भी कहते हैं ना तुम कुल-कलंकित हो। बाबा समझाते हैं - तुम कभी भी कुल कलंकित नहीं बनना। बाप परमधाम से आये हैं तुमको पढ़ाने। भगवानुवाच - मैं राजाओं का राजा बनाने आया हूँ। राजाई जरूर स्थापन होगी। इस समय तुम जितने ब्राह्मण बने हो उतने ही बने थे और बनते रहेंगे।

बच्चों को याद रखना है कि उस पारलौकिक बाबा का कोई बाप नहीं है। वह है ही सुप्रीम नॉलेजफुल, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप चैतन्य, पतित-पावन, रहमदिल, नॉलेजफुल, ब्लिसफुल। उन पर कोई ब्लिस करने वाला नहीं है। वह खुद ही बाप, टीचर, सतगुरू है। बेहद बाप के घर में तुम सम्मुख बैठे हो। यह है ईश्वरीय कुटुम्ब। वृद्धि को पाते जायेंगे। 84 का चक्र भी बुद्धि में याद है। हम सो देवता इतने जन्म, हम सो क्षत्रिय इतने जन्म.... फिर हम सो देवता बनेंगे। माया दु:खधाम बनाती है। बाप आकर सुखधाम बनाते हैं। कितना सहज है। खूब पुरुषार्थ करना चाहिए। अब का पुरुषार्थ कल्प-कल्प के लिए तुम्हारा पुरुषार्थ बन जायेगा। कहेंगे कल्प कल्पान्तर हम ऐसा पुरुषार्थ करते आये हैं। मम्मा-बाबा भी पुरुषार्थ करते हैं। यही फिर पूज्य सो देवी-देवता लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। श्रीमत पर हम श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस अन्तकाल के समय में एक बाप को ही याद करने का अभ्यास करना है। अशरीरी बनना है।

2) कभी भी कुल कलंकित नहीं बनना है, माया के तूफानों में हिलना नहीं है। सदा हर्षित रहना है।

वरदान:-
अपने चेहरे रूपी दर्पण द्वारा मन की शक्तियों का साक्षात्कार कराने वाले योगी तू आत्मा भव

जो मन में होता है उसकी झलक मस्तक पर जरूर आती है। ऐसे नहीं समझना कि मन में तो हमारे बहुत कुछ है। लेकिन मन की शक्ति का दर्पण चेहरा अर्थात् मुखड़ा है। कितना भी आप कहो हमारा योग तो बहुत अच्छा है, हम सदा खुशी में नाचते हैं लेकिन चेहरा उदास देख कोई नहीं मानेगा। “पा लिया'' इस खुशी की चमक चेहरे से दिखाई दे। खुश्क चेहरा नहीं दिखाई दे, खुशी का चेहरा दिखाई दे, तब कहेंगे योगी तू आत्मा।

स्लोगन:-
जब सरल स्वभाव, सरल बोल, सरलता सम्पन्न कर्म हों तब बाप का नाम बाला कर सकेंगे।

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Pune
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