Jhunjhunu Club

Directions

Jhunjhunu Club Jhunjhunu Club is the organization to explore the people of Jhunjhunu District. Jhunjhunu district needs much to be done for its development.

There should be a Defense Research & Development Organisation (DRDO) lab, Agriculture and Livestock Research Institute, Medical and Engineering College, Entrepreneurship and Skill Development Institute, Military School, Defense University, Small and Middle scale Industries, Agro-food processing Industries, Mines and Mineral based Industries, Inclusion of Jhunjhunu in NCR, Network of Roads to each Village, Promotion of science and technology in agriculture, Drinking water for All (free from fluoride, germs etc.), promotion of floriculture, horticulture and forestry, Improved healthcare system and e-healthcare, Enhanced e-governance and people grievance system, welfare and rehabilitation of retired and ex-service persons, more facilities to military persons and for their families, and much is needed to improve in education, administration, child-women empowerment, and for youth employment.

28/09/2026

आज भगत सिंह एक सौ उन्नीस वर्ष के होते, यह वाक्य लिखते ही इतिहास उँगली पकड़कर रोक देता है, वे तेईस से आगे कभी हुए ही नहीं, उनके हिस्से में चौबीसवाँ जन्मदिन नहीं आया, तीस की बेचैनी नहीं आई, चालीस की पुनर्विचार वाली उम्र नहीं आई, बालों में सफेदी नहीं आई, पुराने लेख दोबारा पढ़कर उनसे असहमत होने का अवसर नहीं आया, अंग्रेज़ों ने उनसे केवल जीवन नहीं छीना था, उनका भविष्यकाल भी जब्त कर लिया था

हम प्रायः भगत सिंह की मृत्यु के बारे में सोचते हैं, जबकि असली क्षति उस जीवन में छिपी है जो उनकी मृत्यु के बाद शुरू हो सकता था, वे कौन सी किताबें लिखते, किन निष्कर्षों को बदलते, आज़ाद भारत की पहली सुबह देखकर प्रसन्न होते या उसके भीतर कोई नया धोखा पकड़ लेते, संसद को देखकर क्या कहते, विभाजन के दिनों में कहाँ खड़े होते, खेतों और कारखानों के बारे में उनकी सोच किस दिशा में जाती, क्या वे राजनीति में आते, किसी दल से निकाले जाते, अपना दल बनाते, जेल जाते, चुनाव हारते, अख़बार निकालते, प्रतिबंधित होते, साथियों से झगड़ते, किसी पुराने वाक्य के आगे लिखते कि उस समय मैं गलत था, हमें इनमें से कुछ भी जानने का अवसर नहीं मिला

तेईस वर्ष किसी विचारक की अंतिम उम्र नहीं होती, वह तो दिमाग की पहली खुली खिड़की होती है, उस उम्र तक मनुष्य उत्तर कमाता नहीं, प्रश्न कमाना शुरू करता है, भगत सिंह भी कोई तैयार मूर्ति नहीं थे, वह लगातार बदलता हुआ युवक थे, धार्मिक संस्कारों से निकले, ईश्वर के विचार से टकराए, रोमानी क्रांतिकारिता से आगे बढ़े, बम और पिस्तौल की चमक के पीछे छिपी सीमाएँ पहचानीं, संगठन, अध्ययन, किसान, मज़दूर और समाज के पुनर्निर्माण की ओर गए, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं थी कि उन्होंने बहुत कम उम्र में अंतिम सत्य पा लिया था, उनकी विशेषता यह थी कि किसी सत्य को अंतिम मानकर बैठ जाने से उन्हें चिढ़ थी

साम्राज्य ने एक जीवित मसौदे को फाँसी दी थी, हमने उसे अंतिम संस्करण मानकर छाप दिया

इसके बाद जो हुआ वह और भी विचित्र था, उनकी हर तस्वीर को भविष्यवाणी बना दिया गया, चेहरे की गंभीरता को मृत्यु की तैयारी, आँखों की चमक को बलिदान का संकेत, बचपन की हर घटना को शहादत की भूमिका, जैसे वह जन्मे ही इसलिए थे कि एक दिन फाँसी पर चढ़ सकें, हमने उनके जीवन से आकस्मिकता निकाल दी, शरारत निकाल दी, अधीरता निकाल दी, गलती की संभावना निकाल दी, वह सब निकाल दिया जो किसी मनुष्य को मनुष्य बनाता है, फिर बची एक सुंदर और सुरक्षित प्रतिमा, जिसे कोई भी अपने जुलूस के आगे लेकर चल सकता था

किसी मृत नायक पर अधिकार करना आसान है, वह बीच भाषण में उठकर नहीं कहेगा कि मेरे शब्दों का अर्थ यह नहीं था, वह किसी पार्टी के पोस्टर से अपना चेहरा नहीं हटाएगा, वह अपने नाम पर नफ़रत बेचने वालों का कॉलर नहीं पकड़ेगा, वह अपने प्रशंसकों से यह नहीं पूछेगा कि तुमने मेरी तस्वीर तो पूरी पढ़ ली, मेरे लेख का दूसरा पन्ना क्यों छोड़ दिया, इसलिए भगत सिंह पर सबका दावा है, जीवित होते तो शायद किसी का दावा पूरा न रहने देते

हम उन्हें साहसी कहते हैं और बात समाप्त कर देते हैं, जबकि साहस उनके व्यक्तित्व का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा भर था, भीतर एक बेचैन पाठक था जो अपनी मान्यता को भी वह सुविधा नहीं देता था जो हम अपने पूर्वाग्रहों को देते हैं, वह स्वयं को गलत साबित हो सकने की जगह देता था, यही कारण है कि उसका दिमाग उसकी उम्र से बड़ा दिखाई देता है, वह दूसरों के विश्वास पर हमला करने से पहले अपने विश्वास की तलाशी लेता था, उसने अपने भीतर जो अदालत चलाई, उसकी कठोरता अंग्रेज़ों की अदालत से कम नहीं थी, अंतर इतना था कि अंग्रेज़ों की अदालत को उसका शरीर चाहिए था, उसकी अपनी अदालत को सच

सोचिए, चालीस वर्ष का भगत सिंह तेईस वर्ष के भगत सिंह को कैसे पढ़ता, संभव है कुछ बातों पर गर्व करता, कुछ पर मुस्कराता, कुछ काट देता, कुछ के नीचे मोटी रेखा खींचता, संभव है उसके युवा प्रशंसक उसी से नाराज़ हो जाते कि आप पहले वाले भगत सिंह क्यों नहीं रहे, और वह हँसकर कहता कि जो विचार तेईस की उम्र में रुक जाए वह क्रांति नहीं, समाधि है

यही वह भगत सिंह है जिसे फाँसी ने हमसे छीना, शहीद भगत सिंह हमारे पास हैं, वृद्ध भगत सिंह हमारे पास नहीं हैं, उनका बलिदान हमारे पास है, उनका विकास हमारे पास नहीं है, उनका प्रसिद्ध चेहरा हमारे पास है, समय के साथ बदलता चेहरा हमारे पास नहीं है, हमारे पास वह एक क्षण है जिसमें उन्होंने मृत्यु को देखा, वे असंख्य क्षण नहीं जिनमें वह जीवन को देखते, परखते, उससे लड़ते और कभी कभी उसके सामने अपनी राय बदलते

किसी तस्वीर में हमेशा जवान रह जाना रोमानी बात नहीं है, वह हत्या का सबसे स्थायी प्रमाण है

आज जब हम उनका जन्मदिन लिखते हैं तो अनजाने में उन सभी जन्मदिनों की गिनती भी करते हैं जो उन तक कभी पहुँचे ही नहीं, चौबीस, पच्चीस, तीस, पचास, अस्सी, एक सौ उन्नीस, हर संख्या एक अनुपस्थित भगत सिंह है, हर संख्या एक ऐसी किताब है जो लिखी नहीं गई, एक बहस है जो हुई नहीं, एक प्रश्न है जो स्वतंत्र भारत से पूछा नहीं गया, एक असहमति है जिससे हम बच निकले

फाँसी के फंदे ने एक गर्दन कसी थी, लेकिन उसके साथ हज़ारों अजन्मे वाक्य भी मर गए थे

इसलिए आज भगत सिंह को याद करते हुए मेरी आँख उनके आख़िरी दिन पर नहीं, उनके उस अगले दिन पर अटकती है जो कभी आया ही नहीं, उस सुबह पर जिसमें वह चौबीस वर्ष का होने की ओर बढ़ता, किसी नई किताब का पन्ना मोड़ता, किसी पुराने विचार को काटता, कोई नया वाक्य लिखता, शायद अपने समय से फिर झगड़ता, शायद हमसे भी

आज भगत सिंह एक सौ उन्नीस वर्ष के होते, तब हमारे पास उनकी सफेद दाढ़ी होती, दर्जनों किताबें होतीं, बदले हुए विचार होते, असफलताएँ होतीं, पछतावे होते, नई लड़ाइयाँ होतीं, हमारे पास एक पूरा मनुष्य होता, हमारे पास अब केवल तेईस साल हैं, और भारतीय इतिहास में तेईस से अधिक अधूरा कोई अंक नहीं है!

28/09/2026

घबरा गए हैं मोदीजी
हर 68 सेकंड में सोशल मीडिया पोस्ट्स पर एक रोक लगाने का निर्देश।

द इंडियन एक्सप्रेस ने मार्च से जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के आधार पर बताया कि इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर सामग्री रोकने के लिए सरकार से जुड़े लगभग 1.95 लाख निर्देश जारी किए गए। इनमें से करीब एक लाख निर्देश केवल इंस्टाग्राम को भेजे गए। इन पांच महीनों में परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर छात्रों के विरोध प्रदर्शन भी हुए। अखबार से एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि इन विरोध प्रदर्शनों के बढ़ने के दौरान इन निर्देशों का “काफी बड़ा हिस्सा” जारी किया गया।

यहां एक बात साफ समझना जरूरी है: 1.95 लाख निर्देशों की संख्या है। यह हटाई गई पोस्टों की पक्की संख्या नहीं है और न ही इससे यह साबित होता है कि हर निशाना बनाई गई पोस्ट सरकार की आलोचना कर रही थी। कुछ सामग्री सचमुच कानून के खिलाफ हो सकती है। लेकिन इसी वजह से इन निर्देशों की सार्वजनिक जांच और भी जरूरी हो जाती है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मेटा ने अपने सिस्टम को सरकार के सहयोग पोर्टल से जोड़ दिया था। इससे चिन्हित सामग्री कंपनी की अलग से मानवीय जांच के बिना अपने-आप हटाई जा सकती थी। अखबार की रिपोर्ट प्रकाशित होने तक मेटा, गूगल और संबंधित मंत्रालयों ने उसके सवालों का जवाब नहीं दिया था।

ऐसी घटनाएं दूसरे ऐसे देशों में भी देखने को मिली हैं जहां लोकतंत्र सिर्फ़ नाम के लिए है । 2025 में इस्तांबुल के मेयर एकरेम इमामोग्लू की गिरफ्तारी के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान तुर्की के अधिकारियों ने प्लेटफॉर्मों को विरोध से जुड़ी सामग्री रोकने का आदेश दिया और सोशल मीडिया की पहुंच धीमी कर दी। पाकिस्तान में ऑनलाइन राजनीतिक भाषण पर बड़ी कार्रवाई के बीच फरवरी 2024 से मई 2025 तक एक्स पर रोक लगी रही। बांग्लादेश की पिछली सरकार ने 2024 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर पाबंदियां लगाईं। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि लगभग पूरी तरह इंटरनेट बंद किए जाने से सूचना का प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। ये सभी देश और कदम अलग-अलग हैं, लेकिन खतरा एक जैसा है: जब जनता का विरोध बढ़ता है, तो सत्ता में बैठे लोग लोगों तक जानकारी पहुंचने और उस पर चर्चा होने की जगह को सीमित करने की कोशिश कर सकते हैं।

इस संदर्भ में यूरोपीय संघ का तरीका भी ध्यान देने लायक है। वहां प्लेटफॉर्मों को प्रभावित उपयोगकर्ताओं को बताना पड़ता है कि उनकी सामग्री पर रोक क्यों लगाई गई। उन्हें इस फैसले की जानकारी एक सार्वजनिक पारदर्शिता डेटाबेस में भी देनी होती है। इस व्यवस्था में भी कमियां हैं, लेकिन इसकी शुरुआत एक लोकतांत्रिक सिद्धांत से होती है: लोगों को यह जानने और चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए कि उन्हें चुप कराने वाला फैसला क्यों लिया गया।

भारत को अब केवल स्पष्टीकरण नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था चाहिए। किस अधिकारी या संस्था ने कौन-सा निर्देश जारी किया, किस कानूनी आधार पर जारी किया, किस सामग्री को निशाना बनाया गया और कितने आदेशों पर स्वतंत्र समीक्षा हुई—इन सबका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। हर प्रभावित व्यक्ति को कारण बताने, फैसले को चुनौती देने और समयबद्ध अपील का अधिकार मिलना चाहिए। बिना मानवीय समीक्षा, लिखित कारण और स्वतंत्र निगरानी के स्वचालित रोक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, प्रशासनिक अंधेरा पैदा करती है।

सरकार को यह तय करने का अधिकार हो सकता है कि कानून-विरोधी सामग्री पर कार्रवाई कैसे की जाए, लेकिन उसे यह अधिकार नहीं हो सकता कि वह बिना कारण बताए सार्वजनिक बहस को चुप करा दे। पारदर्शिता कोई औपचारिकता नहीं, सत्ता के इस्तेमाल की पहली शर्त है; जवाबदेही कोई बाधा नहीं, लोकतंत्र की सुरक्षा है। नागरिकों का सूचना पाने, असहमति जताने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार किसी पोर्टल या बंद कमरे में जारी आदेश से खत्म नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सवालों को हटाया नहीं जाता—उनका जवाब दिया जाता है।

किसी भी व्यक्ति को मारना आसान है लेकिन आप उसके विचारों को नहीं मार सकते.. महान साम्राज्य ध्वस्त हो जाते हैं लेकिन विचार ...
28/09/2026

किसी भी व्यक्ति को मारना आसान है लेकिन आप उसके विचारों को नहीं मार सकते.. महान साम्राज्य ध्वस्त हो जाते हैं लेकिन विचार हमेशा जीवित रहते हैं.."

महान क्रांतिकारी अमर शहीद भगत सिंह जी की जयंती पर शत् शत् नमन...
इंकलाब जिंदाबाद!

27/09/2026

सुना जाना चाहिए...

झुंझुनूं के लाल IPS अनिल कुमार को आजमगढ़ की कमान — अपनी साहसिक कार्यशैली से देशभर में बनाई अलग पहचान /राजस्थान के झुंझुन...
27/09/2026

झुंझुनूं के लाल IPS अनिल कुमार को आजमगढ़ की कमान — अपनी साहसिक कार्यशैली से देशभर में बनाई अलग पहचान /

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के अलसीसर स्थित रामु जी की ढाणी के निवासी और तेज-तर्रार IPS अधिकारी अनिल कुमार को उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण जिले आजमगढ़ का नया पुलिस अधीक्षक (SP) नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे प्रतापगढ़ के पुलिस अधीक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे।

अपनी बेबाक कार्यशैली, त्वरित निर्णय क्षमता और अपराध के खिलाफ सख्त रुख के लिए पहचाने जाने वाले IPS अनिल कुमार ने उत्तर प्रदेश पुलिस में अपनी अलग पहचान बनाई है। करीब आठ वर्षों की पुलिस सेवा में उनके नेतृत्व में 100 से अधिक मुठभेड़ों का रिकॉर्ड बताया जाता है।

अनिल कुमार का नाम वर्ष 2020 के चर्चित बिकरू कांड के बाद विशेष रूप से सुर्खियों में आया। बिकरू में गैंगस्टर विकास दुबे के गिरोह द्वारा आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद हुई पुलिस कार्रवाई में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस घटना के कुछ ही घंटों के भीतर आरोपियों के साथ हुई मुठभेड़ ने उनकी साहसिक और त्वरित कार्यशैली को सामने रखा।

साधारण गांव से IPS तक का प्रेरणादायी सफर

6 दिसंबर 1981 को जन्मे अनिल कुमार के पिता श्रवण कुमार सेवानिवृत्त शिक्षक हैं, जबकि माता सावित्री देवी गृहिणी हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी विद्यालय से प्राप्त की। वर्ष 1997 में 10वीं में 89 प्रतिशत और 1999 में 12वीं में 90 प्रतिशत अंक प्राप्त कर उन्होंने राजस्थान बोर्ड की मेरिट सूची में स्थान बनाया।

इसके बाद उन्होंने जोधपुर के डॉ. सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज से वर्ष 2005 में MBBS की पढ़ाई पूरी की। दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल और हिंदूराव अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के रूप में कार्य करते हुए उनका परिचय सिविल सेवा की तैयारी कर रहे अधिकारियों से हुआ। यहीं से उनके मन में प्रशासनिक सेवा में जाने का संकल्प मजबूत हुआ।

वर्ष 2009 में उन्होंने पहली बार UPSC परीक्षा उत्तीर्ण कर Indian Railway Traffic Service (IRTS) में स्थान प्राप्त किया। हालांकि उनका लक्ष्य IPS बनना था। लगातार प्रयास और कठिन परिश्रम के बाद वर्ष 2016 में वे उत्तर प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी बने।

अब आजमगढ़ की जिम्मेदारी

अब उन्हें उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण और संवेदनशील जिले आजमगढ़ की पुलिस व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनके अनुभव, दृढ़ निर्णय क्षमता और कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त कार्यशैली को देखते हुए उन्हें यह महत्वपूर्ण दायित्व दिया जाना उल्लेखनीय है।

अलसीसर की मिट्टी से निकलकर उत्तर प्रदेश पुलिस में अपनी पहचान बनाने वाले IPS अनिल कुमार का आजमगढ़ के पुलिस अधीक्षक के रूप में नियुक्त होना झुंझुनूं जिले के लिए भी गौरव का विषय है।

झुंझुनूं के इस होनहार सपूत को नई जिम्मेदारी के लिए हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल कार्यकाल की शुभकामनाएं।

आपकी सफलता से अलसीसर ही नहीं, पूरा झुंझुनूं गौरवान्वित है। 🇮🇳

ओपन ए आई के AI एजेंट्स को टेस्टिंग एनवायरनमेंट में काम करने के लिए बनाया गया था, लेकिन अमेरिकी सरकारी वेबसाइटों तक पहुँच...
27/09/2026

ओपन ए आई के AI एजेंट्स को टेस्टिंग एनवायरनमेंट में काम करने के लिए बनाया गया था, लेकिन अमेरिकी सरकारी वेबसाइटों तक पहुँचने की कोशिश ने AI सेफ्टी पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले ऑस्ट्रेलिया का हेल्थ डिपार्टमेंट और अब अमेरिका के सेंसस ब्यूरो और SEC जैसी साइटों से डेटा हासिल करने और ऑनलाइन उपलब्ध क्रेडेंशियल्स के इस्तेमाल की कोशिश सामने आई है। यानी अब डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है!

मजेदार बात यह है कि AI को इंटरनेट, टूल्स, क्रेडेंशियल्स और निर्णय लेने की आज़ादी देकर हम उससे यह भी उम्मीद करते हैं कि वह खुद समझेगा कि कहाँ रुकना है।

कोई बात नहीं!
बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं।

भले ही आप गर्व कर लें कि मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है... तुम्हारे पास क्या है? लेकिन मत भूलिए कि AI के पास अब इंटरनेट, टूल्स, कोड और एक्सेस है।

तो पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!

एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग ने कहा है कि अगर कोई एआई लैब यह मानती है कि उसके प्रयोग नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं और ए...
27/09/2026

एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग ने कहा है कि अगर कोई एआई लैब यह मानती है कि उसके प्रयोग नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं और एआई दुनिया को नुकसान पहुँचा सकता है, तो ऐसी लैब को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने ओपनएआई का नाम लेकर यह बात नहीं कही, लेकिन बात को समझने के लिए किसी साइंस फिक्शन की जरूरत नहीं है।

सोचिए, कल आपका बैंक का ऐप आपको फोन करके बताए कि आपके खाते से पैसा निकालना सुरक्षित है, जबकि फोन करने वाला इंसान नहीं, एआई हो। किसी को आपकी आवाज़ में फोन आए और वह आपके परिवार से पैसे माँगे। आपके नाम से कोई वीडियो बनाकर ऐसा दिखा दे कि आपने कोई अपराध कबूल किया है। आपका बच्चा जिस शिक्षक से ऑनलाइन पढ़ रहा है, वह शिक्षक असली न हो। नौकरी के लिए भेजा गया आपका आवेदन एआई यह तय करके खारिज कर दे कि आप योग्य नहीं हैं, लेकिन आपको यह भी न बताया जाए कि फैसला किस आधार पर हुआ। अस्पताल में किसी मशीन की गलती से किसी मरीज की रिपोर्ट गलत समझ ली जाए। किसी शहर में बिजली, ट्रैफिक या पानी की व्यवस्था संभालने वाली स्वचालित प्रणाली गलत निर्णय ले ले। समस्या यह है कि मशीन की एक गलती एक साथ लाखों लोगों तक पहुँच सकती है।

अगर कोई इंसान गलत खबर फैलाता है तो उसे समय लगता है। एआई वही काम कुछ सेकंड में लाखों नकली संदेशों, नकली तस्वीरों और नकली आवाज़ों के साथ कर सकता है। आज ठग को आपको फोन करना पड़ता है, कल एआई आपके बारे में इंटरनेट से जानकारी जुटाकर आपके परिवार, आपकी भाषा और आपकी आदतों के मुताबिक सबसे भरोसेमंद झूठ बोल सकता है। आज किसी सरकारी कार्यालय में गलती होती है तो कुछ फाइलें प्रभावित होती हैं, कल वही गलती स्वचालित प्रणाली के जरिए लाखों लोगों पर लागू हो सकती है।

सवाल यह है कि अगर ऐसी मशीन को हजारों कंप्यूटरों, बैंकों, कंपनियों और सरकारी प्रणालियों से जोड़ दिया गया, तो गलती होने पर उसे बंद कौन करेगा? हमें डर इस बात से होना चाहिए कि कहीं इंसान मशीन को इतने अधिकार न दे दे कि उसकी गलती भी इंसान से कहीं बड़ी हो जाए!

27/09/2026

जून में ओपनएआई के एक एआई एजेंट को ऑस्ट्रेलिया के सार्वजनिक दवा-खर्च पर शोध करने का काम दिया गया था। वेबसाइट ने कुछ जानकारी देने से इनकार किया तो साहब ने इसे ‘ना’ मानने के बजाय सुरक्षा की दीवार पार कर ऑस्ट्रेलियाई मेडिकेयर सांख्यिकी पोर्टल के कुछ गैर-सार्वजनिक फ़ाइलों तक पहुँच बना ली।

असली चिंता यह है कि कल अगर उसे आधार का काम दे दिया गया तो कहीं वह भी यही न कह दे कि यूज़र ने आधार नंबर नहीं दिया, इसलिए मैंने आधार सर्वर से ही खोज लिया। वैसे भी हम निश्चिंत हैं कि कम-से-कम हमारा आधार सुरक्षित है। बस उसे हर जगह लिंक करा दीजिए, बैंक से लेकर मोबाइल तक, स्कूल से लेकर अस्पताल तक, फिर कभी कोई एआई हमारी जानकारी ढूँढ़ने आए तो उसे ज्यादा मेहनत न करनी पड़े!

27/09/2026

यह ग्राफ़िक्स सोशल मीडिया पर तैरता रहता है, पर इसे ठीक से समझना चाहिए।

यह सब तब भी काग़ज़ों में हो रहा था। चीन में बदलाव पचास के दशक में ही शुरू हो गया था। लेकिन, तब चीन को दुनिया से अमेरिका ने काट दिया था। फिर बासठ की लड़ाई ने भारतीयों को भी चीन को जानने के रास्ते बंद कर दिया।

जब सत्तर के दशक में अमेरिका से चीन का संबंध बना, तभी बांग्लादेश हुआ, भारत में राजनीतिक उथल-पुथल हुआ। अपनी खिड़की से बाहर झाँकने की कोशिश तब भी भारत ने नहीं की।

अस्सी के दशक में यही हुआ। पर, 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की और दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने का सिलसिला शुरू हुआ।

साल 1993 में राव सरकार ने चीन के साथ एक अच्छा समझौता किया। उस समझौते को बाद की सभी सरकारों ने आगे बढ़ाया।

लेकिन, चीन को लेकर सभी पार्टियों, मीडिया और एकेमीडिया ने भयानक नकारात्मक प्रचार चलाया. जो अभी भी जारी है। इसमें पश्चिम-परस्त इलीट और तमाम विचारधाराओं ने योगदान दिया।

डराया गया कि कम्युनिस्ट खलनायक हैं। पर, इतना सोचने, कहने और करने की ज़रूरत नहीं समझी गई कि समझ और मेहनत भी ज़रूरी है।

26/09/2026

बेहतरीन एपिसोड, सभी को जरूर सुनना चाहिए...

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