Shree Vinayak Recruiters

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15/06/2020

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24/04/2018

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27/05/2016

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02/05/2015

बिलासपुर ! कर्जदारों को प्रताडि़त करने और उनका आर्थिक शोषण करने वाले सूदखोरों के खिलाफ पुलिस ने अभियान छेड़ दिया है और गिरफ्तारियां भी की जा रही है, मगर यक्ष प्रश्न यह है कि पुलिस उन रसूखदार सूदखोरों जो राजनैतिक दल से भी ताल्लुख रखते हैं, के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकेगी? रेलवे क्षेत्र के कई ऐसे पेशेवर सूदखोर जिनके पास हजारों की संख्या में कर्जदारों के हस्ताक्षर वाले कोरे स्टाम्स, एटीएम कार्ड, बैंक पास बुक आदि हैं, मगर पुलिस के पास उनके विरुद्ध कोई शिकायत नहीं है। कर्जदार उनके खिलाफ शिकायत करने से डर रहे हैं। वहीं पुलिस ने शिकायतों के आधार पर जितने लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया है उनमें ज्यादातर लोगों से अभी कोई दस्तावेज बरामद नहीं हुआ है।
आईजी पवनदेव के निर्देश पर शहर के विभिन्न थानों में तीन दर्जन से अधिक सूदखोरों के खिलाफ अपराध दर्ज किया गया है। सभी के विरुद्ध कर्जा एक्ट और कर्ज वसूली के लिए डराने धमकाने धारा 384 के तहत मामला कायम किया गया है। सूदखोरों के खिलाफ कार्रवाई स्वागतेय है मगर जल्दबाजी में ऐसी कार्रवाई न हो कि मामला कोर्ट में न ठहर सके और आरोपियों को लाभ मिल सके। सूदखोरों के विरुद्ध चलाए गए अभियान से निश्चित रुप से गरीबों का आर्थिक शोषण करने वाले सूदखोरों के व्यवसाय पर अंकुश लगेगा एवं अनेकों पीडि़तों को राहत मिलेगी, मगर पुलिस को उनके विरुद्ध साक्ष्य जुटाने में काफी मशक्कत भी करनी पड़ेगी। अन्यथा साक्ष्य के अभाव में कोर्ट से कई आरोपियों को संदेह का लाभ मिल सकता है। जिन कर्जदारों ने हिम्मत करके पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है उन्हें राहत मिलेगी या नहीं यह बाद का विषय है मगर शिकायत पर पुलिस ने जिन सूदखोरों के विरुद्ध कार्रवाई की है उनसे कर्जदारों के हस्ताक्षर वाले कोरे स्टाम्प, एटीएम, पास बुक आदि भी जप्त करने होंगे तभी उनके खिलाफ पुख्ता मामला बन सकेगा अभी तो जल्दबाजी में सबके विरुद्ध एक ही तरह की धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया जा रहा है ऐेसे में ब्याज का व्यवसाय करने वाले कई ऐसे लोग जिनका धमकी चमकी और नियम विरुद्ध कार्य से वास्ता न हो वे भी गेहंू में घुन की तरह पुलिस कार्रवाई की कार्रवाई में आ सकते हैं। जानकारी के मुताबिक रेलवे क्षेत्र में अभी भी सैकड़ों ऐसे पीडि़त कर्जदार हैं जो पुलिस में रिपोर्ट करने जाने से डर रहे हैं। वहीं अनेक ऐसे सूदखोर हैं जिनके पास हजारों की संख्या में कर्जदारों के हस्ताक्षर वाले कोरे स्टाम्प, एटीएम, बैंक पास बुक, बैंक का विड्राल फार्म आदि हैं और पुलिस उन तक शिकायत के अभाव में पहुंच नहीं पा रही है और पुलिस कार्रवाई होने की खबर पर ऐेसे सूदखोर या तो गायब हो गए हैं या फिर कर्जदारों के गिरवी रखे तमाम दस्तावेज ठिकाने लगाने लग गए हैं। सूदखोरों के साथ ही कई रेलवे कर्मियों व बैंक वालों की भूमिका पर भी पुलिस को जांच करनी चाहिए क्योंकि उन्हीं लोगों की सांठगांठ के कारण ही बड़ी संख्या में सूदखोर रेलवे व अन्य क्षेत्र में पनपे हैं। कर्जदारों की गैर मौजूदगी में उनके हस्ताक्षर वाले विड्राल फार्म पर सूदखोर बैंकों से राशि निकालते रहे हैं यह सब बैंक अमले के सांठगांठ के बगैर कदापि संभव नहीं है।
कुछ पीडि़त कर्जदार रेलवे कर्मी तो सूदखोरों के आतंक से रेलवे की नौकरी तक छोड़ देने विवश हो चुके हैं। इसके विपरित ब्याज का धंधा करने वाले कई ऐसे लोग भी पुलिस कार्रवाई के डर से भयभीत हैं जो शातिर सूदखोरों की तरह प्रताडि़त करने का काम नहीं करते। उनको डर है कहीं कोई उनके विरुद्ध झूठी शिकायत न कर दे। पुलिस तो अभी बिना साक्ष्य के सिर्फ शिकायत के आधार पर जुर्म दर्ज कर रही है। इसी बीच पुलिस की कार्रवाई से ऐसे सूदखोर भी हलाकान हैं जो राजनैतिक पहुंच रखते हैं। उन्होंने अपने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर पुलिस पर दबाव डलवाने कोई कसर भी बाकी नहीं रखा है। बात तो तब बनेगी जब पुलिस राजनैतिक सूदखोरों के गिरेबां पर हाथ डालेगी।
साहूकार नहीं होंगे तो कई बेटियों के हाथ पीले होना असंभव
एक लायसेंसी सूदखोर ने पुलिस की कार्रवाई को पूरी तरह निष्पक्ष होने में संदेह जताते हुए कहा कि यदि पुलिस सारे सूदखोरों पर सब धान बाइस पंसेरी की तरह कार्रवाई की तो ब्याज का कानूनन व नियमों के अंतर्गत धंधा करने वाले भी जरुरतमंदों को मदद करने से हाथ खींच लेंगे ऐसे में जरुरतमंद कहां जाएंगे? साहूकारों के नहीं रहने पर कई बेटियों के हाथ पीले नहीं हो पाएंगे।
ऐसी स्थिति में पुलिस को चाहिए कि दोषियों पर बिना किसी दबाव के कड़ी कार्रवाई करें और वैध ढंग से व्यापार करने वालों पर शातिर सूदखोरों की तरह व्यवहार न हो। सूदखोरों की तरह व्यवहार न हो। सूदखोरी का धंधा करना अपराध नहीं है मगर कर्जदारों को प्रताडि़त करना अवश्य जुर्म है। धारा 3, 4 कर्जा एक्ट के तहत कार्रवाई किया जाना जायज और जरुरी है मगर धारा 384 के तहत सभी के विरुद्ध प्रकरण दर्ज करना समझ से परे है।

02/05/2015

:: Pavan Jain ::

सूदखोरों के खिलाफ अभियान
पुलिस की भूमिका भीड़ पर डंडे बरसाने, अपराधियों की धरपकड़ कर कानून के कटघरे में खड़े करने,बात-बात में रोक-टोक और निरोधक कार्रवाई करने तक ही सीमित नहीं है उसके दायरे में और भी काम होसकते हैं, जो जनता में उसकी खलनायकी छवि को धो-पोंधकर सकारत्मक छवि प्रस्तुत कर सकते हैं सीहोर जिले की पुलिस ने इन दिनों एक ऐसा ही अभियान सूदखोरी के खिलाफ चला रखा है। पिछले कुछ दिनों में सूदखोरों के बर्बर शिकंजे में फंसे कोई 10 कर्जदारों द्वारा खुदकुशी करने के हादसों से ऐसे अभियान की जरूरत, सार्थकता और औचित्य प्रमाणितहोती है, ज्यादा समय नहीं बीता जब सरगुजा जिले में भी पुलिस ने सूदखोरों के खिलाफ मुहिम छेड़ कर सैकड़ों गरीब बेबस आदिवासियों को शोषण और प्रताड़ना के दुश्चक्र से मुक्ति दिलाई थी। संयोग से जिस नौजवान पुलिस अफसर पवन जैन ने सरगुजा में यह अभियांन चलाया था,उसी के हाथ में आज सीहोर पुलिस प्रशासन की बागडोर है, फिरंगी काल से चली आ रही छवि के चलते पुलिस कर्मियों का किसी बस्ती या घर में आना सामाजिक तौर पर सहज स्वीकार्य नहीं माना जाता, लेकिन सीहोर जिले के पुलिस कर्मी जब गांव-गांव पहुंचकर परचे बांटते हैं, दीवारों पर पोस्टर चस्पा करते हैं, लोगों से मिल-जुल कर सुदखोरी के वाकये जानते और तथ्य इकट्ठा करते हैं, तब लोगों के चेहरों पर भय के नहीं विश्‍वास के भाव झलकते हैं, स्थानीय लोग उत्साह के साथ उनसे जुड़ते हैं, उन्हें बताते हैं कि कैसे एक हजार रू. का कर्ज हजार रूपये चुकाने के बाद भी ‘चुकता’ नही हो पाया है किसी का घर सूदखोरों ने हड़प लिया है, तो किसी की भैंस-स्कूटर या खेत पर कब्जा कर लिया है। उल्लेखनीय तथ्य यह कि 95 फीसदी सूदखोरों के पास लाइसेंस नहीं होता। 5 मई से चलाये गए इस अभियान में 100 से जयादा कर्जदारों कोमुक्ति मिल चुकी है, 8 सूदखोरों के खिलाफ प्रकरण दर्ज हो चुके हैं। 6 को जेल भेजा जा चुका है, ज्यादातर तो कानूनी कार्रवाई के डर से ही कर्जदारों को कुक्त करने लगे हैं, लेकिन जहां समझाइश का असर नहीं होता, वहां पुलिस सूदखोरों को हवालात की हवा खिलाने में भी संकोचनहीं करती। इस सिलसिले में पुलिस चार कानूनों का सहारा ले रही है- (1) कर्ज संबंधी कानून धारा 4 जो प्रताड़ना का निशेध करती है, (2) आई.पी.सी. की धारा 384 जो आर्थिक शोषण से रोकती है, (3) आई.पी.सी. धारा 392 जिसमें कर्ज वसूली के लिए भैंस खोल ले जाना या कोई सामान उठा ले जाना लूट के अंतर्गत आता है और (4) अजा-अजजा कानून जो इन कमजोर वर्गों को शोषण दमन से सुरक्षा प्रदान करता है। यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि सीहोर जिले को इन अभियान के चलते सूदखोरी के अभिशाप से एकदम और पूरी तरह मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन एक सकारात्मक वातावरण जरूर बन रहा है, जिससे शोषित पीडित जनता की काफी हद तक राहत मिल रही है। इस तरह के अभियान प्रदेश भर में चलना चाहिये। खासतौर से ऐसे मौसम में जब फसल आने के बाद छोटे किसानों और मजदूरों के हाथ में भी चार पैसे होतेहैं और यही वह समय होता है जब सूदखोर उनके पसीने की पाई-पाई हड़प लेने में लगे होते हैं।

सरकार ने कानून बनाकर सूदखोरी पर रोक लगा रखी है. उल्लंघन पर सजा का भी प्रावधान है. लेकिन पर्याप्त बैंकिंग सुविधाओं के अभा...
02/05/2015

सरकार ने कानून बनाकर सूदखोरी पर रोक लगा रखी है. उल्लंघन पर सजा का भी प्रावधान है. लेकिन पर्याप्त बैंकिंग सुविधाओं के अभाव में बहुत से लोग साहूकारों के चंगुल में फंस कर कर्ज के भंवर जाल में फंस जाते हैं.

कानून में व्यवस्था है कि कर्ज देने वाले साहूकार को अपना पंजीकरण कराना होगा और निर्धारित दर से अधिक ब्याज नहीं वसूलना चाहिए. कोई कर्ज न अदा करे तो उसकी वसूली भी प्रशासन की सहायता के बगैर नहीं होनी चाहिए.

पुलिस डीआईजी आशुतोष पांडे का कहना है कि जो लोग इस तरह सूदखोरी का शिकार होते हैं, वे गरीब और कमजोर तबकों के होते हैं और कई बार उनके परिवार को भी नहीं पता होता कि इतने ऊँचे ब्याज पर कर्ज लिया है.

पांडे का कहना है कि अभी समाज में इस बात की जागरूकता नहीं है कि यह भी एक अपराध है. उन्होंने कहा, “लेने वालों को पता नहीं रहता कि यह भी एक अपराध है. मीडिया को नहीं पता रहता कि यह भी एक अपराध है. हमारी पुलिस को भी नहीं पता था कि यह भी एक अपराध है. यह अपराध है यह किसी को पता नहीं था. इस चीज को उजागर करना, लोगों को इस मामले संवेदनशील बनाता है.”

लोगों को अपना कारोबार चलाने या घरेलू जरूरतों के लिए उधार की पूंजी चाहिए और अगर बैंक या दूसरी वित्तीय संस्थाएं लोगों को आसानी से कर्ज उपलब्ध नहीं कराएंगी तो फिर साहूकार लोगों की मजबूरी का फायदा उठाएंगे ही, पर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहकर इस पर कुछ हद तक समाधान तो पाया ही जा सकता है।

20/08/2013

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