02/05/2015
:: Pavan Jain ::
सूदखोरों के खिलाफ अभियान
पुलिस की भूमिका भीड़ पर डंडे बरसाने, अपराधियों की धरपकड़ कर कानून के कटघरे में खड़े करने,बात-बात में रोक-टोक और निरोधक कार्रवाई करने तक ही सीमित नहीं है उसके दायरे में और भी काम होसकते हैं, जो जनता में उसकी खलनायकी छवि को धो-पोंधकर सकारत्मक छवि प्रस्तुत कर सकते हैं सीहोर जिले की पुलिस ने इन दिनों एक ऐसा ही अभियान सूदखोरी के खिलाफ चला रखा है। पिछले कुछ दिनों में सूदखोरों के बर्बर शिकंजे में फंसे कोई 10 कर्जदारों द्वारा खुदकुशी करने के हादसों से ऐसे अभियान की जरूरत, सार्थकता और औचित्य प्रमाणितहोती है, ज्यादा समय नहीं बीता जब सरगुजा जिले में भी पुलिस ने सूदखोरों के खिलाफ मुहिम छेड़ कर सैकड़ों गरीब बेबस आदिवासियों को शोषण और प्रताड़ना के दुश्चक्र से मुक्ति दिलाई थी। संयोग से जिस नौजवान पुलिस अफसर पवन जैन ने सरगुजा में यह अभियांन चलाया था,उसी के हाथ में आज सीहोर पुलिस प्रशासन की बागडोर है, फिरंगी काल से चली आ रही छवि के चलते पुलिस कर्मियों का किसी बस्ती या घर में आना सामाजिक तौर पर सहज स्वीकार्य नहीं माना जाता, लेकिन सीहोर जिले के पुलिस कर्मी जब गांव-गांव पहुंचकर परचे बांटते हैं, दीवारों पर पोस्टर चस्पा करते हैं, लोगों से मिल-जुल कर सुदखोरी के वाकये जानते और तथ्य इकट्ठा करते हैं, तब लोगों के चेहरों पर भय के नहीं विश्वास के भाव झलकते हैं, स्थानीय लोग उत्साह के साथ उनसे जुड़ते हैं, उन्हें बताते हैं कि कैसे एक हजार रू. का कर्ज हजार रूपये चुकाने के बाद भी ‘चुकता’ नही हो पाया है किसी का घर सूदखोरों ने हड़प लिया है, तो किसी की भैंस-स्कूटर या खेत पर कब्जा कर लिया है। उल्लेखनीय तथ्य यह कि 95 फीसदी सूदखोरों के पास लाइसेंस नहीं होता। 5 मई से चलाये गए इस अभियान में 100 से जयादा कर्जदारों कोमुक्ति मिल चुकी है, 8 सूदखोरों के खिलाफ प्रकरण दर्ज हो चुके हैं। 6 को जेल भेजा जा चुका है, ज्यादातर तो कानूनी कार्रवाई के डर से ही कर्जदारों को कुक्त करने लगे हैं, लेकिन जहां समझाइश का असर नहीं होता, वहां पुलिस सूदखोरों को हवालात की हवा खिलाने में भी संकोचनहीं करती। इस सिलसिले में पुलिस चार कानूनों का सहारा ले रही है- (1) कर्ज संबंधी कानून धारा 4 जो प्रताड़ना का निशेध करती है, (2) आई.पी.सी. की धारा 384 जो आर्थिक शोषण से रोकती है, (3) आई.पी.सी. धारा 392 जिसमें कर्ज वसूली के लिए भैंस खोल ले जाना या कोई सामान उठा ले जाना लूट के अंतर्गत आता है और (4) अजा-अजजा कानून जो इन कमजोर वर्गों को शोषण दमन से सुरक्षा प्रदान करता है। यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि सीहोर जिले को इन अभियान के चलते सूदखोरी के अभिशाप से एकदम और पूरी तरह मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन एक सकारात्मक वातावरण जरूर बन रहा है, जिससे शोषित पीडित जनता की काफी हद तक राहत मिल रही है। इस तरह के अभियान प्रदेश भर में चलना चाहिये। खासतौर से ऐसे मौसम में जब फसल आने के बाद छोटे किसानों और मजदूरों के हाथ में भी चार पैसे होतेहैं और यही वह समय होता है जब सूदखोर उनके पसीने की पाई-पाई हड़प लेने में लगे होते हैं।